रंग-बिरंगे भारत अद्भुत विविधताओं से भरा एक विशाल देश है, जहाँ अनार, आम, इमली, ईख, उल्लू, ऊन, ऋषि, एकता, ऐनक, ओस, औषधि और अंगूर जैसी अनेक वस्तुएँ हमारे दैनिक जीवन और भाषा का हिस्सा हैं। प्रातःकाल गाँव की माँ अपने आँगन में बैठकर बच्चों को प्रकृति का महत्व समझाती है। किसान खेतों में काम करते हैं, खरगोश घास के बीच दौड़ते हैं, गायें चरती हैं और घोड़े खुले मैदान में घूमते हैं। चंचल चिड़ियाँ छज्जे पर चहचहाती हैं, जहाज़ आकाश में उड़ता है और झरने का निर्मल पानी जंगल से होकर बहता है। टमाटर से भरी टोकरी लेकर ठेलेवाला बाज़ार जाता है, डमरू और ढोल की आवाज़ सुनकर बच्चे उत्साहित हो जाते हैं तथा नन्ही तितलियाँ रंग-बिरंगे फूलों के आसपास मंडराती हैं। तरबूज़, थाली, दही, धनुष और नदी देखकर बच्चे नए शब्द सीखते हैं। पतंग, फल, बकरी, भालू और मछली जैसे शब्द उनके अभ्यास को रोचक बनाते हैं। युवक रथ के पास खड़ा होकर लहरों, वर्षा, शांत वातावरण, षट्कोण और सुंदर हरियाली के विषय में अपने मित्र से बातचीत करता है। विद्यालय में शिक्षक क्षमा, त्रिशूल, ज्ञान और श्रद्धा जैसे संयुक्त अक्षरों वाले शब्द भी समझाते हैं।

हिंदी के शब्दों में अलग-अलग मात्राओं का सुंदर प्रयोग मिलता है। कमल और अजगर जैसे शब्द बिना लिखित मात्रा के अ की ध्वनि दिखाते हैं; अनार, आकाश और बाज़ार में आ की ध्वनि आती है; किताब, किरण और किसान में छोटी इ की मात्रा दिखाई देती है; दीपक, खीर और नदी में बड़ी ई की ध्वनि मिलती है; गुलाब, कुत्ता और पुस्तक में उ की मात्रा आती है; फूल, सूरज और झूला में ऊ की ध्वनि सुनाई देती है; कृपा, कृष्ण और वृक्ष में ऋ की मात्रा का प्रयोग होता है; केला, सेब और मेरा में ए की मात्रा है; पैसा, बैल और नैना में ऐ की मात्रा आती है; मोर, टोपी और घोड़ा में ओ की मात्रा मिलती है तथा कौआ, पौधा और खिलौना में औ की मात्रा का प्रयोग होता है। अंगूर, संतरा, मंदिर और संसार में अनुस्वार का प्रयोग मिलता है; माँ, चाँद, गाँव, साँप और हँसी में चंद्रबिंदु दिखाई देता है; दुःख, प्रातः, स्वतः और अंततः जैसे शब्द विसर्ग के प्रयोग को स्पष्ट करते हैं। शक्ति, भक्त, मित्र, प्रश्न, शब्द, तथ्य, विद्या, बुद्धि, स्वच्छ, स्वास्थ्य, उद्देश्य और व्यक्तित्व जैसे शब्द हलंत से बनने वाले संयुक्त व्यंजनों के विविध रूप दिखाते हैं।

हमारी हिंदी ने दूसरी भाषाओं से आए अनेक शब्दों को भी अपनाया है, इसलिए नुक्ते का प्रयोग महत्वपूर्ण है। क़लम, क़ीमत, क़ानून और क़दम में क़; ख़बर, ख़ुशी, ख़तरा और ख़ूबसूरत में ख़; ग़रीब, ग़ज़ल, ग़लती और ग़ुस्सा में ग़; ज़मीन, ज़रूरत, ज़िंदगी और बाज़ार में ज़; फ़सल, फ़िल्म, फ़ायदा और सफ़र में फ़; लड़का, लड़की, सड़क और पहाड़ में ड़; तथा पढ़ाई, बढ़ना, चढ़ाई और गढ़ में ढ़ का प्रयोग मिलता है। कुछ लेखन-परंपराओं में झ़ जैसे अत्यंत दुर्लभ नुक्तायुक्त रूप भी मिल सकते हैं, लेकिन वे सामान्य मानक हिंदी शब्दावली का नियमित हिस्सा नहीं हैं।

एक विद्यार्थी जब विद्यालय में हिंदी पढ़ता है, तो वह केवल अक्षर नहीं सीखता बल्कि भाषा की पूरी संरचना समझता है। अध्यापक उसे कमल, खिड़की, गिलहरी, घड़ी, अंगूर, चम्मच, छतरी, जहाज़, झंडा, पञ्चांग, टोकरी, ठंड, डमरू, ढक्कन, गणेश, तरबूज़, थर्मस, दर्पण, धनुष, नमक, पतंग, फूल, बच्चा, भैंस, मकान, योग, रस्सी, लड्डू, वन, शेर, षट्कोण, साबुन और हाथी जैसे शब्दों से व्यंजनों की अलग-अलग ध्वनियाँ समझाता है। वह क्षत्रिय, त्रिकोण, ज्ञान, विज्ञापन, श्रमिक, संस्कृति, स्वतंत्रता, राष्ट्र, चिह्न, ब्रह्मांड और गृह जैसे कठिन संयुक्त अक्षरों वाले शब्द भी पढ़ता है। इस प्रकार नियमित अध्ययन, लेखन और उच्चारण के अभ्यास से विद्यार्थी हिंदी वर्णमाला, स्वर, व्यंजन, मात्राएँ, अनुस्वार, चंद्रबिंदु, विसर्ग, संयुक्ताक्षर और नुक्तायुक्त अक्षरों का स्वाभाविक रूप से प्रयोग करना सीखता है और उसकी भाषा अधिक शुद्ध, स्पष्ट तथा समृद्ध होती जाती है। 